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Showing posts from March, 2015

મિસિંગ બક્ષી એ પુસ્તક નહીં પણ વાસ્તવિકતા છે!

ચંદ્રકાંત બક્ષી.... સરકારી બાબુઓ પ્રત્યે આપણો આક્રોશ જાણીતો છે. પણ બક્ષીજી એમના પરિચિતો અને મિત્રોના નામ પાછળ બાબુ લગાવીને સંબોધન કરે ત્યારે લોકોને આત્મીયતાનો અહેસાસ થતો હશે. જે હાથેથી એ ઉષ્માસભર શેકહેન્ડ કરતાં એ જ હાથમાં જ્યારે કલમ આવતી ત્યારે ઉષ્માનું સ્થાન ઉચાટ લેતો અને બક્ષીબાબુના એ જ હાથે પકડેલી કલમમાંથી આગઝરતું લખાણ ઝરવા લાગતું. વાઈસે વર્સા પણ એટલું જ લાગુ પડે છે. ગુજરાતી સાહિત્યમાં ઘણાંની કીર્તિના ઊંચે ઊડતા વિમાનોને બક્ષીબાબુએ એમની આલોચનાનાં રડારમાં ટપકાં સ્વરૂપે ઝીલીને શબ્દોની ગાઈડેડ મિસાઈલથી ટપકાવીને સર્જેલા ગમખ્વાર સાહિત્યિક અકસ્માતોનું તો અલગ સંપાદન થઈ શકે. બક્ષીની નવલકથાના બધા પાત્રો બક્ષીની જ ભાષા બોલે છે એવો આક્ષેપ થતો, પણ બક્ષીના ચાહકો પણ તેમના અંગત જીવનમાં બક્ષીની ભાષા બોલતા થઈ જતા હોય, બક્ષીનુમા વિવાદાસ્પદ વર્તન કરતાં હોય તો પછી એમના પાત્રોનો શું વાંક?  ધારો કે એમના મૃત્યુ પછી પ્રકટ થયેલા બે સંપાદનો "મિસિંગ બક્ષી" અને "બક્ષી અને અમે" વાંચવા પૂરતાં બક્ષીબાબુ સજીવન થાય તો આ બંને પુસ્તકોને કદાચ હાસ્યના પુસ્તકોમાં ખપાવી દે એવું એમને અંજલિ આપત...

अपनी मरजी से कहाँ अपने सफर के हम हैं (निदा फ़ाज़ली)

अपनी मरजी से कहाँ अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं; पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता हैं, अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं; वक्त के साथ है मिटटी का सफर सदियों से, किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं; चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब, सोचते रहते हैं किस राह गुज़र के हम हैं; गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम, हर कलमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं;                                                                        --- निदा फ़ाज़ली

फिर छिड़ी रात बात फूलों की / मख़दूम मोहिउद्दीन

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की रात है या बरात फूलों की । फूल के हार, फूल के गजरे शाम फूलों की रात फूलों की । आपका साथ, साथ फूलों का आपकी बात, बात फूलों की । नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं मिल रही है हयात फूलों की । कौन देता है जान फूलों पर कौन करता है बात फूलों की । वो शराफ़त तो दिल के साथ गई लुट गई कायनात फूलों की । अब किसे है दमाग़े तोहमते इश्क़ कौन सुनता है बात फूलों की । मेरे दिल में सरूर-ए-सुबह बहार तेरी आँखों में रात फूलों की । फूल खिलते रहेंगे दुनिया में रोज़ निकलेगी बात फूलों की । ये महकती हुई ग़ज़ल 'मख़दूम' जैसे सहरा में रात फूलों की ।                                                                        (मख़दूम मोहिउद्दीन)

यार से प्यार की बातों को ग़ज़ल कहते है (फ़ैसल)

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यार से प्यार की बातों को ग़ज़ल कहते है ज़ुल्फ़-ओ-रुख़सार की बातों को ग़ज़ल कहते है प्यार से महकी हुई होशरुबा रातों में दिल से दिलदार बातों को ग़ज़ल कहते है कभी इकरार की बातों को बताते है ग़ज़ल कभी इन्कार की बातों को ग़ज़ल कहते है दिल जो सौदाई किसी ज़ुल्फ़-ए-गिरह गीर का हो उस गिरफ़्तार की बातों को ग़ज़ल कहते है बड़ी कामियाब हुआ करती है दौलत ग़म की ग़म से दो'चार की बातों को ग़ज़ल कहते है जिस चमन जर्र में होती हैं दिलों की बातें उस चमन जर्र की बातों को ग़ज़ल कहते है कि हैं जिन लोगों ने तन्हाई मे बताई वो लोग दर-ओ-दीवार की बातों को ग़ज़ल कहते है कभी वाईज़ के खयालों से छलकती है ग़ज़ल कभी मयख़्वार की बातों को ग़ज़ल कहते है हो गया हो जिसे देखे हुए एक अरसा फ़ैसल उस के दीदार की बातों को ग़ज़ल कहते है