खूबसूरती पर एक कविता



खूबसूरती के अंदर मुझे आप यह बताओ कि आपकी पर्सनली क्या कमाई है, खूबसूरती हासिल करने में ?

पंक्तियां थीं कि

खूबसूरती जो कमाई नहीं ताप की
अनायास मिलती है शक्ल मां बाप की

खूबसूरती जो कमाई नहीं ताप की
अनायास मिलती है शक्ल मां बाप की

खुद निखरने लगती है, खुद ही ढल जाती है
मेहनत तो इसमें न ढेली भर है आपकी!

फिर भी अकड़ आसमान अड़ जाती है
सुंदरी इतर बावली हो मंडराती है

चमड़ी के निखार का भी घमंड उसे
जो धूप लगते मात्र ही में सड़ जाती है

और वास्तविक खूबसूरती तो स्वभाव है
बौद्धिक लोगों का इसी बात पे झुकाव है

और आप जिसे खूबसूरती बताते हैं
कुछ नहीं वो आपका हार्मोनल चढ़ाव है!

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